Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 93, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
केषुचिन्न निबध्नाति रूक्षेषु मधुरेषु च ।
रणितेषु रतिं राम पद्मेष्विव निशाकरः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, केवल बाह्य विषयों मेँ आसक्ति रखनेवाले मनुष्यों का संसर्ग छोडकर या संकल्प छोडकर समय
अनुसार प्राप्त हुए व्यवहारो के अनुष्ठान से, सांसारिक मनोरथो के त्याग से तथा शरीर मेँ
विनाशित्वबुद्धि से वासना प्रवृत्त नहीं होती