Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 69
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 93, verse 69 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 69
संस्कृत श्लोक
संविन्मात्रपरिस्पन्दे जागते वस्तुपञ्जरे ।
किं हेयं किमुपादेयमिह तत्त्वविदां मतम् ॥ ६९ ॥
हिन्दी अर्थ
संविन्मात्र के परिस्पन्दनस्वरूप जगत् के पिंजडे में क्या हेय ओर क्या उपादेय हो सकता
है ? अर्थात् न कुछ हेय है ओर न कुछ उपादेय है, यह तत्त्वज्ञो का मत हे