Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 70
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 93, verse 70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
संविदेवेदमखिलं भ्रान्तिमन्यां त्यजानघ ।
संविन्मयवपुः स्फारं किं जहाति किमीहते ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
हे पापशून्य
श्रीरामजी, यह समस्त जगत् संवितात्मक ही है, अतः आप अन्यता-भ्रान्ति का परित्याग कर
दीजिए । जो प्रकाशात्मक चितुप्रचुर स्वरूपवाला तत्त्व है, वह क्या त्यागेगा और क्या ग्रहण
करेगा ?