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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 93, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

क्व नभोमध्यसंस्थेन्दुर्मुग्धैर्मणिसमुद्गकैः । मुग्धयाऽङ्गनया बद्धो मुग्धेन्दीवरशङ्कया ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शका हो कि शोधन से संवित्‌-अश का त्याग होने पर एकमात्र सवेद्यांश का ध्यान भी उपाय क्यो नहीं होगा, तो नहीं, क्योकि व्ह अशक्य है, ऐसा उत्तर देते है । हे राघव, केवल संवेद्य के विषय में यानी केवल विषय में ध्यान ही नहीं हो सकता, क्योकि सर्वत्र सब अवस्थाओं मे इसी संवित्‌ का ही संभव है यानी विषयों से पहले प्रस्फुरित हो रही संवित्‌ का तिरोधान अशक्य है ओर उसका यदि तिरोधान हो जायेगा, तो विषय की स्फूर्ति न होने से उसका ध्यान ही नहीं हो सकेगा