Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 75
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 93, verse 75 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 75
संस्कृत श्लोक
गतसङ्गेन मनसा कुर्वन्नपि न लिप्यते ।
सुखदुःखैर्महाबाहो मनोरथदशास्विव ॥ ७५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महाबाहो, जिस प्रकार कोई भी मनोराज्य की संपत्तियों
के नष्ट होने या न होने पर, तज्जनित सुखदुःखों से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष
संगरहित मन से कर्मानुष्ठान करे, चाहे न करे, तज्जनित सुख दुःखों से लिप्त नहीं होता