Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 1, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 1, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
रश्मिष्वगगुहोन्मुक्तच्छायाजालभयादिव ।
गवाक्षादिष्विवोड्डीय प्रविष्टेषु गृहान्तरम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
अखण्डार्थ का बोध होने पर मेरे उपदेश के बिना भी इस प्रश्न का उत्तर आप स्वयं जान जायेंगे,
ऐसा कहते हैं।
यदि आप अपने-से उस आत्मा को जान लेते हैं, तो इस प्रश्न के उत्तर को अपने आप भलीभाँति
जान जायेंगे, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है