Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 10, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
तत्र दूरस्थिता मुक्तिर्मन्ये वेद्यविदां वर ।
सुप्तपुर्यष्टका यत्र चित्स्थिता दुःखदायिनी ।
मूकान्धजडवत्तत्र सत्तामात्रेण तिष्ठति ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
हे ज्ञातव्य (ब्रह्म) के जाननेवालों में सर्वश्रेष्ठ श्रीरामजी, चित्अचित् का विवेक करने में असमर्थ
बाह्य एवं आन्तर इन्द्रियों से युक्त, अतएव दुःख का प्रतीकार करने में अक्षम होने के कारण अत्यन्त
दुःख देनेवाली चिति जहाँ स्थित रहती है, उन स्थावर शरीरो में मोक्ष अत्यन्त दूर रहता है, ऐसा मैं
मानता हूँ; वहाँ कर्मेन्द्रियों से, ज्ञानेन्द्रियों के व्यापारो से तथा मानस व्यापारं से शून्य होकर केवल
सत्तामात्र से चिति रहती हे