Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 10, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
सत्ताद्वैततया यत्र संस्थिता स्थावरेषु चित् ।
तत्रादूरस्थिता मुक्तिर्मन्ये वेद्यविदां वर ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रियों के व्यापारों से शून्य होकर यदि सत्तामात्र से चिति स्थावर शरीर मे रहती
है, तो वैसी स्थिति में योगियो की तरह शीघ्र ही वासना का क्षय एवं मन का विनाश हो जाने से उनकी
मुक्ति अदूरस्थित है - यही कहना उचित था, अतः दुरस्थिता मुक्तिः” यह कह रहे आपका क्या
अभिप्राय है 2 इस आशय से श्रीरामजी पूछते हैं।
श्रीरामजी ने कहा : हे वेद्यविदों मे श्रेष्ठ, जिन स्थावर शरीरो में चिति एकमात्र सत्तारूप से स्थित
रहती है, वहाँ मुक्ति तो अदूर ही स्थित है, ऐसा मैं मानता हू