Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 10, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
अस्यास्त्वदर्शनं यत्तदविद्येत्युच्यते बुधैः ।
अविद्या हि जगद्धेतुस्ततः सर्वं प्रवर्तते ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
इस आत्मदृष्टि का जो अदर्शन (आत्मसाक्षात्कारविरोधी आवरणस्वरूप अदर्शन) है,
उसे विद्वान लोग अविद्या कहते हैं, चूँकि अविद्या जगत की कारणभूत है, अतः उसी से सम्पूर्ण
पदार्थों की उत्पत्ति होती है