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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 10, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अविद्येत्युच्यते लोके चिच्चेत्यमलमाश्रिता । चेत्यातीतात्मतामेति सर्वोपाधिविवर्जिता ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

चेत्य के बीजभूत मल का सत्ता के आरोप से आश्रय करती हुई चिति ही जगत में अविद्या नाम से कही जाती है ओर वही चेत्य के बीजभूत मल का अतिक्रमण करती हुई सम्पूर्णं उपाधियों से मुक्त होकर विद्या से आत्मरूपता को प्राप्त हो जाती हे