Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 10, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
चित्तमात्रं हि पुरुषस्तस्मिन्नष्टे च नश्यति ।
स्थिते तिष्ठति चात्मायं घटे सति घटाम्बरम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार अविद्या का स्वरूप बतलाकर अब अविद्या-कार्यरूप उपाधि से आत्मा में बन्ध का
विभ्रम दिखलाते हैं।
चित्त का तादात्म्य अध्यास होने से यह पुरुष चित्तप्राय है, इसीलिए चित्त के नष्ट होने पर वह पुरूष
मानों नष्ट हो जाता है। और जैसे घट के रहने पर घटाकाश रहता है, वैसे ही चित्त के स्थित होने पर यह
आत्मा भी स्थित रहता है