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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 10, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

गच्छन्पश्यति गच्छन्तं स्थितं तिष्ठञ्छिशुर्यथा । भ्रान्तमेवमिदं चेतः पश्यत्यात्मानमाकुलम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार गति, स्थिति आदि चित्तधर्मों का भी अपनी आत्मा में पुरुष आरोप कर लेता है, यों कहते हैं। अज्ञानी बालक की नाईं यह अज्ञान उपहित आत्मा चित्त के चलनेपर अपने आपको चलता हुआ देखता है, चित्त के स्थिर होने पर अपने को भी स्थिर देखता है, यह आत्मा इस तरह भ्रान्त इस चित्त को ही व्याकुल आत्मस्वरूप से देखता है