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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 10, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

कोशकारवदात्मानं वासनातनुतन्तुभिः । वेष्टयच्चैव चेतोऽन्तर्बालत्वान्नावबुध्यते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

इसीलिए वह चित्तगत वासनाओं से अपने को बाँधता है, यों कहते हैं। चूँकि यह चित्त बाल यानी विवेकशून्य है, इसलिए वह चित्तप्राय पुरुष मकड़ी की तरह अपने को चित्तगत वासनारूप दीर्घतन्तुओं से भीतर बोधिता हुआ भी नहीं जानता