Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 100, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
भ्रमाकृति यदस्तीह दृश्यतेऽलातचक्रवत् ।
मृगतृष्णाद्विचन्द्रादिबालवेतालकादिवत् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
तव चित्त आदि हैं, इस अनुभव की क्या दशा होगी, यदि ऐसी आशंका हो, तो उसका उत्तर यह है
कि वह सब बिलकुल भरान्तिमात्र है, इसे अनेक दृष्टान्तो से बतलाते है ।
अलातचक्र के सदृश भ्रमाकृति जो यहाँ जगत्, चित्त आदि दिखाई देता है वह मृगतृष्णाजल, दो
चन्द्र आदि की भ्रान्ति तथा बालकल्पित वेताल आदि की नाई हे