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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, Verses 17–18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 100, verses 17–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 17,18

संस्कृत श्लोक

तत्कथं किल नाम स्यात्सत्यं श्रमभरात्मकम् । अज्ञानभ्रान्तिरेवान्तश्चित्तमित्येव कथ्यते ॥ १७ ॥ अज्ञानमुच्यते चित्तमसत्सदिव संस्थितम् । असंवेदनमज्ञानं ज्ञानं संवेदनं भवेत् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

ठीक है, तब तो भ्रान्ति के एक बहुत बड़े पुंजरूप उसे सत्‌ ही मान लीजिये । नहीं, ऐसा कहते है । हे महीपते, जो सर्वथा भ्रमपुंजस्वरूप है वह भला सत्य नाम से कैसे कहा जा सकता है ? अज्ञानजनित भ्रान्ति ही अन्तःकरण ओर चित्तादिशब्दों से कही जाती हे । सत्‌ की नाई अवस्थित असत्‌ अज्ञान ही चित्त कहा जाता हे । अज्ञान असंवेदनस्वरूप है और ज्ञान हे संवेदनरूप