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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 100, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

चिन्मात्रमजरं शान्तं यदेकं तत्प्रमीयते । तेनैवायं जगद्ब्रह्म सच्छान्तं बुद्ध्यते वपुः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

चिन्मात्ररूप प्रमा से ही यह जगत्‌ ब्रह्मरूप बन जाता है और अतत्त्वाकार मन की भ्रान्ति से ब्रह्म जगद्रूप बन जाता है, यह कहते हैं। चिन्मात्र अजर शान्त जो एक वस्तु है वही प्रमा की विषय की जाती है, उसीसे यह जगत्‌ सत्‌, शान्त ब्रह्मरूप जाना जाता है (तथा ब्रह्म ही अतत्त्वाकार मन की भ्रान्ति से जगद्रूप से अवबुद्ध होता है)