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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verses 1–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 101, verses 1–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 1-7

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इति कुम्भवचो राजा भावयंस्तदकृत्रिमम् । स्वयमात्मपदे तस्मिन्क्षणं परिणतोऽभवत् ॥ १ ॥ बभूवामीलितमनोलोचनः शान्तवाङ्मुनिः । शिलातलादिवोत्कीर्णो निस्पन्दावयवाकृतिः ॥ २ ॥ ततो मुहूर्तमात्रेण प्रबुद्धं स्फुरितेक्षणम् । तमुवाच महाबाहो चूडाला कुम्भरूपिणी ॥ ३ ॥ कुम्भ उवाच । कच्चिदस्मिन्पदे स्फारे शुद्धे विततनिर्मले । सुतल्पे निर्विकल्पानां सुखं विश्रान्तवानसि ॥ ४ ॥ कच्चिदन्तः प्रबुद्धोसि कच्चिद्भ्रान्तिस्त्वयोज्झिता । कच्चिज्ज्ञेयं परिज्ञातं दृष्टं द्रष्टव्यमेव वा ॥ ५ ॥ शिखिध्वज उवाच । भगवंस्त्वत्प्रसादेन महाविभवभूमिका । महती पदवी दृष्टा सर्वस्योर्ध्वं स्थिता मया ॥ ६ ॥ सतां विदितवेद्यानामहो बत महात्मनाम् । अपूर्वैकामृतमयः सङ्गः सारफलप्रदः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह अकृत्रिम कुम्भ के उस कथन का विचार कर रहे राजा शिखिध्वज अपने पूर्व भाव को छोडकर क्षण भर स्वयं उस आत्मपद में प्राप्त हो गये । शिलातल में खोदी गई स्पन्दनशून्य अवयवो से युक्त आकारवाली प्रतिमा की नाई वह राजा मन ओर नेत्र के व्यापारो को बन्दकर शान्तवाक्‌ मुनि हो गये । हे महाबाहो, उसके बाद एक मुहूर्त में प्रबुद्ध हुए अतएव विकसित नेत्रवाले उस राजा से कुम्भरूपिणी चूडाला बोल उठी । कुम्भ ने कहा : हे महाबाहो, महान, शुद्ध, विस्तृत, निर्मल तथा योगियों की सुन्दर शय्या के समान इस निरतिशयानन्द पद में क्या आप विश्रान्त हो चुके ? राजन्‌, क्या आप अन्तःकरण से प्रबुद्ध हो चुके ? क्या आपने अपनी भ्रान्ति छोड दी ? क्या आपने ज्ञेय पदार्थ का अच्छी तरह ज्ञान कर लिया ? क्या आपने द्रष्टव्य वस्तु देख ली ? राजा शिखिध्वज ने कहा : हे भगवन्‌, आपकी दया से मैंने वह महती आत्मपदवी देख ली, जो निरतिशयानन्दरूपी भूमिका तथा हिरण्यगर्भ के आनन्दतक विषयानन्दसमूह के ऊपर (उत्कर्ष की पराकाष्ठा में) अवस्थित है । अहो, वेद्य वस्तु को जान लेनेवाले सज्जन महात्माओं का संग इस अनादि संसार में कभी भी अनुभूत न होनेवाला जो निरतिशयानन्द है तत्प्रचुर हे, अतः सर्वोत्कृष्ट फल का प्रदाता है

सर्ग सन्दर्भ

सौरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ एकवा सर्ग ज्ञान की दृढता से राजा शिखिध्वज की कृतकृत्यता, जीवन्मुक्ति में अचित्तता तथा तत्त्व की स्थिति का वर्णन |