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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verses 8–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 101, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 8 ,9

संस्कृत श्लोक

जन्मनापि मया लब्धं यन्नाम न महामृतम् । तदद्य त्वत्समासङ्गात्तेनैवासादितं स्वयम् ॥ ८ ॥ अनन्तमाद्यममृतं चैतत्कमललोचन । कथं नासादितमभूत्पूर्वमात्मपदं मया ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

“सदा एकरूप“ इस विशेषण से अन्य विकारों का खण्डन किया गया है, यह समझ लेना चाहिए । सामान्यरूप से कही गई बात की विशेषरूप से व्याख्या करते हैं। भगवन्‌, जिस महाअमृत की प्राप्ति महा अमृतस्वरूप ही मैंने अज्ञानवश सारे जन्म में नहीं की, आज आपके समागम से उसकी मैंने स्वयं अनायास ही प्राप्ति की । हे कमललोचन, अनन्त ओर आद्य इस अमृतरूपी आत्मपद को मैंने पहले ही क्यों नहीं प्राप्त किया ?