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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verses 18–23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 101, verses 18–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 18-23

संस्कृत श्लोक

यावदस्य दिनस्यैष पूर्वभागो महीपते । तावच्चेतोहंममेति तवाज्ञानं बभूव ह ॥ १८ ॥ इदानीं मद्वचोबोधाच्चेतसि क्षयमागते । हृदयात्संपरित्यक्ते संप्रबुद्धोऽसि भूपते ॥ १९ ॥ हृदि यावन्मनःसत्ता तावदज्ञानसस्थितिः । चित्ते चित्ततया त्यक्ते ज्ञानस्याभ्युदयो भवेत् ॥ २० ॥ द्वित्वैकत्वदृशौ चित्तं तदेवाज्ञानमुच्यते । एतयोर्यो लयो दृष्टेस्तज्ज्ञानं सा परा गतिः ॥ २१ ॥ प्रबुद्धोऽसि विमुक्तोऽसि त्यक्तं चित्तं त्वया नृप । सदसत्तामयत्वं हि त्वया त्यक्तमसत्पदम् ॥ २२ ॥ वीतशोको निरायासो निःसङ्गोऽनन्य आत्मवान् । महोदयो मुनिर्मौनी स्वरूपे तिष्ठ निर्मले ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

आपका अज्ञान आज ही मध्याहकाल में क्षीण हुआ है, यह मुझे अच्छी तरह मालूम है, यह कहते हैं । हे महीपते, जब तक आज के दिन का यह पूर्वभाग अवशेष था, तभी तक आपको चित्त में “अह, मम" इत्यादिरूप अज्ञान भी बना हुआ था, यह मुझे खूब मालूम है । हे भूपते, आज ही मध्याह में मेरे वचनों के ज्ञान से हृदय से बिलकुल हटा दिये गये आपके चित्त के क्षीण होने पर आप प्रबुद्ध (आत्मज्ञान से सम्पन्न) हुए हैँ । जब तक हृदय में मन की सत्ता बनी रहती है तब तक अज्ञान की संस्थिति जमी रहती हे । अचित्तरूप से (निःस्वरूपताबुद्धि से) चित्त का परित्याग हो जाने पर ज्ञान का अभ्युदय होता हे । द्वित्व ओर एकत्व की दृष्टि ही चित्त है वही अज्ञान कहा जाता हे । परमात्मा की अभिव्यक्ति से जो इन दोनों का लय है वही ज्ञान है ओर वही परा गति है । हे राजन्‌, अब आप प्रबुद्ध हो चुके, विमुक्त हो चुके, क्योकि आत्मा में एक दूसरे के परस्पर अध्यास से सत्‌ और असद्रूप चित्त का आपने (७) देखिये स्मृति : कषायपक्तिः कर्माणि ज्ञाने तु परमा गतिः । कषाये कर्मभिः पक्वे ततो ज्ञानं प्रजायते ॥ (४) रागादि कषाय ओर पाप । परित्याग कर दिया, जो जगत्‌ की कल्पना का स्थान है । हे महीपते, अव आप शोकशून्य, आयासरहित, निःसंग, अनन्य, आत्मज्ञानसम्पन्न ओर महान्‌ उदय से युक्त मौनी बनकर निर्मल स्वरूप में अवस्थित रहिये