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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verses 30–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 101, verses 30–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 30-32

संस्कृत श्लोक

जीवन्मुक्ता महात्मानः सत्त्वस्थाः संयतेन्द्रियाः । विहरन्ति गतासङ्गं न चित्तस्थाः कदाचन ॥ ३० ॥ मूढं चित्तं चित्तमाहुः प्रबुद्धं सत्त्वमुच्यते । अप्रबुद्धा हि चित्तस्थाः सत्त्वस्थास्तु महाधियः ॥ ३१ ॥ भूयः प्रजायते चित्तं सत्त्वं भूयो न जायते । अप्रबुद्धस्य बन्धोस्ति न प्रबुद्धस्य भूपते ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

जीवन्मुक्तो के व्यवहाराभास में वही कारणाभास है, यह कहते हैँ । जितेन्द्रिय जीवन्मुक्त महात्मा लोग सत्त्व मे स्थित होकर आसक्ति छोड करके विहार करते हैं, चित्त में स्थित होकर कभी नहीं । मूढ चित्त को चित्त कहते हैं ओर प्रबुद्ध चित्त को सत्त्व कहते हैं, अप्रबुद्ध (अज्ञानी) लोग चित्त में स्थित रहते हैं ओर महाबुद्धिमान्‌ (ज्ञानी) लोग सत्त्व में स्थित रहते हे । चित्त पुनः उत्पन्न होता है, लेकिन सत्त्व फिर उत्पन्न नहीं होता । हे भूपते, अप्रबुद्ध को बन्ध है, प्रबुद्ध को नहीं