Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verses 43–45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 101, verses 43–45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 43-45
संस्कृत श्लोक
तपोरूपा विकल्पांशास्तत्र बद्धपदो भव ।
चिद्व्योम्नोनभसोत्यच्छात्सर्वेभावाः समुत्थिताः ॥ ४३ ॥
तथैव परिदृश्यन्ते तत्रैव विलयं गताः ।
इदं कार्यमिदं नेति संकल्पा ब्रह्मबिन्दवः ॥ ४४ ॥
वन्ध्यं शिखिध्वज त्यक्त्वा पूर्णमेव समाश्रय ।
इष्टं मे प्रार्थयस्वेति यथैव प्रार्थ्यते सखे ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञान के फल चिदाकाश का लाभ होने से सभी का लाभ हो गया, क्योकि सम्पूर्ण जगत् की एक
उसीसे उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होता है, ऐसी श्रुति है, इस आशय से कहते हैं।
आकाश से भी अति स्वच्छ उस चिदाकाश से सभी पदार्थ समुत्पन्न होकर दिखाई पड़ते हैं तथा
उसी चिदाकाश में विलय को भी प्राप्त हो जाते हैँ । हे मित्र शिखिध्वज, यद्यपि यह कार्य हे और यह कार्य
नहीं हे इत्यादि सभी तरह के संकल्प ब्रह्मरूपी समुद्र के विन्दु ही हैं तथापि तुच्छ होने से वे निष्फल हे,
इसलिए इन सबको छोडकर पूर्ण का ही (समुद्रस्थानीय निर्विशेष का ही) समाश्रय कीजिये । हे सखे,
जैसे कोई सत्री, जिसको अभी तक पति प्राप्त नहीं हुआ है, प्राप्त करने योग्य पति के प्रति “मेरे इष्ट की
सिद्धि के लिए थोडी-सी प्रार्थना कर दो यों दूसरी प्रार्थना करती है, वैसे ही स्वयं उस पति की ही क्यों
नहीं प्रार्थना करती ? तात्पर्य यह कि स्वाधीनतापूर्वक उस पतिका लाभ हो जाने पर तो उसके अधीन
में रहनेवाली वस्तुओं का अपने-आप ही लाभ हो जायेगा