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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verse 42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 101, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

आद्यन्तावस्य सुमते मध्य एव सुखं स्म भो । यतस्ते समयो जातो यस्मिन्परिणमन्ति च ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वगदि महासुख की हेतु तपस्या अनर्थरूप कैसे है, इस पर कहते हैं। हे सुमते, इस तपस्या का आदि भाग आचरणावस्था है और अन्तिम भाग फलक्षयावस्था है, इसलिए इसके आदि और अन्त दोनों भाग दुःखरूप हैँ । केवल इसका मध्य जो स्वर्गादि भोगावस्था है उसीमें कुछ सुख है। तब क्या मैंने व्यर्थ ही तपस्या की, इस पर “नहीं' ऐसा कहते हैं । चूँकि तपस्या के द्वारा ही आपके चित्तगत कषायों का परिपाक होने से इस समय तत्त्वज्ञान का समय प्राप्त हुआ है, इसलिए सभी तपोरूप विकल्पांश जिस अविकल्प तत्त्वज्ञान में परिणत होते हैं और जिसके फल से फलवान्‌ भी बनते हैं, उस ज्ञान में आप स्थिर हो जाइये । भाव यह है कि “विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसा" इत्यादि श्रुतिप्रमाण होने से तत्त्वज्ञानप्राप्तिरूप फल से ही आपकी तपस्या की सफलता हे