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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verse 47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 101, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

गृह्णन्ति न महात्मानः प्राज्ञा जलरवीनिव । स्वर्गमोक्षादिफलदं यत्किंचित्सर्वमेव तत् ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञानप्राप्ति के अनन्तर स्वगदि- साधनो के समान अपवर्ग के साधन भी हेय ही हो जाते हैं, इस आशय से कहते हैँ । स्वर्ग ओर मोक्ष आदि फल प्रदान करनेवाले जो कुछ कर्म हैं, उन सबका त्यागकर सबमें समानरूप से भासमान जो आप हैँ वही आप निश्चित बने रहिये