Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 101, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
त्यक्त्वा समसमाभासो योऽस्यसावेव वै भव ।
सत्त्वं सत्त्वेन नाशेन नाश्यं हि विगतस्पृहः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त की चंचलता के बिना समस्त पदार्थों में सद्ू-अंश का सतत्वरूप से ओर असद्-अंश का नित्य
नष्टस्वरूप से ग्रहण करना चाहिए, इसे कहते है ।
हे राजन्, समस्त अभिलाषाओं को छोडकर इन सब पदार्थों में सत्व का सत्त्वरूप से और नाश्य का
नाशरूप से ग्रहण करते हुए आप अपने चित्त को परिस्पंदशून्य बनाकर अवस्थित रहिये