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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verses 49–53

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 101, verses 49–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 49-52

संस्कृत श्लोक

पदार्थौघमिमं गृह्णंस्तिष्ठास्पन्दितचित्तभूः । अपरिस्पन्दचित्तस्य संसृतिर्नेह धावति ॥ ४९ ॥ पौरुषप्रभवा साधो विपत्तिर्हि मतौ यथा । यानि यानीह दुःखानि प्रस्फुरन्ति जगत्त्रये ॥ ५० ॥ चेतश्चापलजान्येव तानि तानि महीपते । स्थिरं शान्तं गतस्पन्दं यस्य चित्तमचापलम् । सदैव स महानन्दी साम्राज्यस्य स भाजनम् ॥ ५१ ॥ अथ चेतसि तत्त्वज्ञ स्पन्दास्पन्दौ त्वमेकताम् । नीत्वा तिष्ठ यथाकाममैक्यमागत्य शाश्वतम् ॥ ५२ ॥ शिखिध्वज उवाच । कथमैक्यं विभो यातः स्पन्दास्पन्दाविमावुभौ । सर्वसंशयविच्छेदकारिन्नेतद्वदाशु मे ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

-अस्पन्दितचित्तमूः“ इस कथन का प्रयोजन बतलाते है । क्योकि अपरिस्पन्दित चित्तवाले पुरुष को संसार की प्राप्ति उस तरह नहीं होती, जिस तरह विवेकज्ञान का उदय होने पर स्वाभाविक प्रवत्तिरूपी पुरुष के अपराध से उत्पन्न विपत्ति प्राप्त नहीं होती | हे महीपते, इन तीनों जगत्‌ में जो-जो दुःख मनुष्यों के निकट पहुँचते हैं वे सबके सब चित्त की चपलता से ही उत्पन्न हुए रहते हँ । इसलिए जिसका चित्त स्थिर, शान्त, स्पन्दनशून्य और अचपल है वही पुरुष सदा परमानन्दी है तथा वही आवरणशून्य होने के कारण साम्राज्य का (आत्मसाक्षात्कार का) भाजन है । हे तत्त्वज्ञ, आप स्पन्द ओर अस्पन्द को साक्षिमात्रस्वरूप के अवलोकन से एक बनाकर उस साक्षी को भी शाश्वत ब्रह्मात्मा के साथ एकता में पहुँचाकर भूमानन्दभाव से पूर्णकाम होकर अवस्थित रहिये