Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 101, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
सस्पन्दा चित्तदभिधा निःस्पन्दा त्वियमातता ।
तुर्यातीतपदारूढा वाचा वक्तुं न पार्यते ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
स्पन्दनयुक्त
चिति सर्गनाम से कही जाती है ओर स्पन्दनशून्य चिति तो तुर्यातीतपद में आरूढ है इस व्यापक चिति
को हम वाणी से कहने में पार नहीं पा सकते