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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 102, Verses 14–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 102, verses 14–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 14-17

संस्कृत श्लोक

शाम्यामि परिनिर्वामि सुखमासे च केवलम् । तृणाग्रमपि नेच्छामि संस्थितोऽस्मि यथास्थितम् ॥ १४ ॥ एवं संचिन्तयन्राजा नूनं निर्वासनाशयः । शैलादिव समुत्कीर्णो मौनमेवावतस्थिवान् ॥ १५ ॥ तस्मिन्नेव ततो मौने निःसंकल्पे निराश्रये । प्रतिष्ठां निश्चलां प्राप्य स तस्थौ गिरिश्रृङ्गवत् ॥ १६ ॥ स तत्र संशान्तभयोऽचिरेण चिरेण विश्रान्तमतिः समात्मा । चिरेण संप्राप्तनिजामलात्मा योगेन सुष्वाप ततोऽदितात्मा ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

उसीसे अपनी पूर्णकामता का वर्णन करते है। मैं शान्ति का अनुभव कर रहा हूँ, मैं खूब तृप्त हो रहा हूँ तथा एकमात्र सुख से अवस्थित हू । तृण का अग्रभाग भी अब मैं नहीं चाहता । मैं जैसा हूँ वैसा ही अपने स्वरूप में अवस्थित हूँ । इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि यों सोच रहा, वासनाओं से शून्य अन्तःकरण से युक्त वह राजा शिखिध्वज, पत्थर में खुदी गई प्रतिमा के समान, वागादि चेष्टाओं से रहित होकर समाधि में अवस्थित हो गया | उसके बाद (4) "साध्वी स्त्रियों द्वारा पतिकृत नमस्कार के ग्राह्य न होने से” वह कुम्भरूपिणी चूडाला नहीं चाहती थी कि मेरा स्वामी मुझे नमस्कार करें, इसलिए वह स्वयं प्रणाम कर शीघ्र अन्तर्हित हो गई । निर्विकल्प और उसी समाधि में अचल प्रतिष्ठा प्राप्त कर वह राजा शिखिध्वज पर्वत के शिखर के सदुश अवस्थित हो गया । वह राजा शिखिध्वज उस समाधि में अपने निर्मल स्वरूप को प्राप्त कर समरस बन करके चिरकाल के बाद विश्रान्तमति होने से शीघ्र ही समस्त भयों से छुटकारा पाकर चिरकाल से चले आ रहे योग के द्वारा परिपूर्णस्वभाव होकर सो गया अर्थात्‌ सुषुप्त की नाईं विश्राम करने लगा