Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 102, Verses 1–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 102, verses 1–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 1-13
संस्कृत श्लोक
कुम्भ उवाच ।
इति ते कथितं सर्वं शिखिध्वज महीपते ।
यथेदमुत्थितं सर्वं यथा च प्रविलीयते ॥ १ ॥
एतच्छ्रुत्वा च बुद्ध्वा च मत्वा च मुनिनायक ।
यथेच्छसि तथा तिष्ठ दृष्टे स्पष्टे परे पदे ॥ २ ॥
स्वर्गं गच्छाम्यहं पर्वकालेऽस्मिन्नारदो मुनिः ।
ब्रह्मलोकात्समायातो भवत्यमरसंसदि ॥ ३ ॥
न मां पश्यति चेत्तत्र तत्कोपमुपगच्छति ।
नोद्वेजनीया भव्येन गुरवो हि कदाचन ॥ ४ ॥
त्यक्तसंकल्पलेखेन न किंचिदभिवाञ्छता ।
त्वया सदैव वस्तव्यं दृष्टिरेषैव पावनी ॥ ५ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति यावत्प्रतिवचः पुष्पहस्तः शिखिध्वजः ।
प्रणामाय ददात्येष तावदन्तर्धिमाययौ ॥ ६ ॥
प्रतिभानगतं वस्तु यथैवान्ते न दृश्यते ।
न दृष्टवांस्तथा कुम्भमग्रे राजा शिखिध्वजः ॥ ७ ॥
गते कुम्भे महीपालः परं विस्मयमाययौ ।
तमेव चिन्तयंश्चित्रं चित्रार्पित इवाभवत् ॥ ८ ॥
इदं संचिन्तयामास चित्रं विलसितं विधेः ।
यत्कुम्भव्यपदेशेन बोधितोऽस्मि चिरोदयम् ॥ ९ ॥
क्व नारदसुतः कुम्भः क्वाहं नाम शिखिध्वजः ।
केवलं कालयुक्त्यैव सोऽहं संपरिबोधितः ॥ १० ॥
अहो नु सम्यक्कथितं देवपुत्रेण युक्तिमत् ।
अहो नु संप्रबुद्धोऽस्मि मोहनिद्राकुलश्चिरात् ॥ ११ ॥
क्वाहमासं विनिर्मग्नः क्रियाजालकुकर्दमे ।
इदं कार्यमिदं नेति मिथ्या विभ्रमचक्रके ॥ १२ ॥
अहो नु शीतला शुद्धा शान्तेयं पदवी निजा ।
रसायनोद्भवाकारा सत्त्वं शीतयतीह मे ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुनिनायक, इसको गुरु और शास्त्र से सुनकर तथा अपने विचार से मननकर भलीभाँति समझ
करके साक्षात् दृष्ट तथा आवरण का नाश हो जाने से स्पष्ट हुए परमपद में किसी समय समाधि की
प्रधानता से तथा किरी समय व्यवहार से जैसा आप चाहें वैसा ही अवस्थित रहिये । अब तो मैं इन्द्र की
सभा में जा रहा हू । इस पर्वकाल में भगवान् नारदमुनि इन्द्र की सभा मे ब्रह्मलोक से आ गये होगे । यदि
वहाँ मुझे वे न देख पायेंगे, तो बहुत क्रुद्ध होंगे । भव्य पुरुष को कभी भी गुरुओं को उद्वेजित (करुद्ध) नहीं
करना चाहिए। संकल्प की लेखा छोडकर किसी भी वस्तु की अभिलाषा न रखते हुए आप सदा आत्मदृष्टि
में ही अवस्थित रहियेगा, क्योकि यही एक परम पवित्र दृष्टि है, जिसका मैंने आपको उपदेश दिया है ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, यों कहकर वह कुम्भरूपिणी चूडाला - हाथ में फूल लेकर
कुम्भ को प्रणाम करने के लिए राजा शिखिध्वज ज्यों ही प्रतिवचन बोलना चाहते हैं त्यों ही - अन्तर्हित
हो गई (७) । जैसे स्वप्न आदि में प्रतिभा में आयी हुई धानादि वस्तु अन्त में (जागने पर) दिखाई नहीं
देती वैसे ही राजा शिखिध्वज ने अपने आगे अवस्थित कुम्भ को नहीं देखा । कुम्भ ऋषि के चले जाने पर
राजा शिखिध्वज परम विस्मय को प्राप्त हो गया । उसी आश्चर्य को सोच रहा वह चित्रलिखित की नाई
स्थित हो गया। राजा शिखिध्वज ने यह विचार किया कि यह विधाता की ही विचित्र लीला है कि कुम्भ
के ब्याज से सदा अभ्युदयस्वरूप ब्रह्म का मुञ्चे बोध कराया गया । कहाँ तो नारदमुनि का पुत्र कुम्भ ओर
कहाँ मै तुच्छ शिखिध्वज ? केवल यह भाग्योदयकाल के संयोग से ही वह मे भली-र्भोति बोधित हुआ।
अहो, देवपुत्र ने कैसा सर्वाग सुन्दर युक्तियुक्त कहा, अहो, मोहनिद्रा मेँ व्याकुल पड़ा हुआ मैं अब
चिरकाल के वाद प्रबुद्ध हुआ । मैं कहाँ क्रियाजालरूप कुत्सित कीचड़ में फस गया था, जो यह करना
चाहिए, यह नहीं करना चाहिए, इत्यादि विभ्रम का चक्ररूप था। अहो, यह प्रत्यक्ष की गई आत्म-स्वरूप
विशुद्ध ओर शीतल साम्राज्यपदवी अमृतोद्भव सुधाकर की आकृति से युक्त है । वह वासनाशून्य मेरे
मन को यहाँ खूब शीतल कर रही है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ एकवाँ सर्ग समाप्त एक सौ दोवोँ सर्ग अनुज्ञा लेकर कुम्भ ऋषि के अन्तर्हित हो जाने पर विस्मित हुए राजा शिखिध्वज की चिरकाल तक विचार करने के बाद समाधि में विश्रान्ति कुम्भ ऋषि ने कहा : हे महीपते शिखिध्वज, जिस तरह यह सब विश्व उत्पन्न होता है तथा जिस तरह प्रलय को प्राप्त होता हे, वह सब कुछ अध्यारोप ओर अपवाद से पूर्ण ब्रह्मतत्त्व ही मेने आपसे कहा हे ।