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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verse 62

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 101, verse 62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 62

संस्कृत श्लोक

प्राप्तोऽसि सारं स्वमनादिमध्यमत्रैव तिष्ठ स्वपदे निविष्टः । नो रूपनिर्भेदमहाचिदात्मा जातोऽसि साधो खलु वीतशोकः ॥ ६२ ॥

हिन्दी अर्थ

आप भी स्वानुभूति की प्राप्ति कर चुके हैं, इसलिए मेरे वचन से केवल उसे स्थिर कर लीजिये, यह कहते हैं। आदि ओर मध्य से शून्यस्वरूप को आप प्राप्त हो चुके हैं, अतः आप अपने इसी पद में निविष्ट होकर अवस्थित रहिये । भेदक देहादिरूपों का अभाव होने से ही सब देहों में आपका भेद नहीं है। यही कारण है कि आप महान्‌ चितिस्वरूप तत्त्वबोध से प्रादुर्भुत हुए हैं। इसीलिए हे साधो, आप शोकशून्य हैं