Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 103, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
भृशं संशान्तचित्तस्य काष्ठलोष्टसमस्थितेः ।
सत्त्वशेषः कथं ब्रह्मन्ज्ञायते ध्यानशालिनः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
^स्पशनिन नयेन च“ - यह जो कहा गया इसमें नयशब्दार्थ की जिज्ञासा कर रहे श्रीरामचन्द्रजी
पूषतेहै।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, अत्यन्त शान्तचित्त, काष्ठ ओर लोष्ट के समान स्थितिवाले
ध्यानशाली प्राणी का सत्त्वशेष कैसे जाना जाता हे