Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, Verses 24–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 103, verses 24–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 24-27
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
प्रबोधकारणं यस्य दुर्लक्ष्याणुवपुर्हृदि ।
विद्यते सत्त्वशेषोऽन्तर्बीजे पुष्पफलं यथा ॥ २४ ॥
चित्तस्पन्दवियुक्तस्य तस्यास्पन्दितसच्चितः ।
द्वित्वैकत्वविहीनस्य समस्याचलसंस्थितेः ॥ २५ ॥
कायः समसमाभोगो न ग्लायति न हृष्यति ।
नास्तमेति न चोदेति सममेवावतिष्ठते ॥ २६ ॥
द्वित्वैकत्वादियुक्तस्य यस्य प्रस्पन्दते मनः ।
तस्य देहोऽन्यतामेति नास्पन्दस्य कदाचन ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
देह मे वुद्धि, विपरिणाम, अपक्षय आदि विकारों का अनुदय सत््वशेष में हेतु है, ऐसा उत्तर देने के
लिए हेतुगम्य का अनुवाद करते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, जैसे बीज के अन्दर पुष्प और फल दुर्लक्ष्य अणु के
सदृश ही विद्यमान रहता है वैसे ही जिस किसी ध्यानशाली प्राणी में जगाने के कारण हैं उसके हृदय में
अणु की नाई अगम्य सत्त्वशेष विद्यमान रहता है । चित्त के विकार से शून्य, निश्चल सत्-चिद्रूप बन
गये, निर्विकल्प, सर्वस्वरूप ओर अचल पर्वत की नाई संस्थितिवाले उस पुरुष का शरीर, सवमें एकरूप
से रहनेवाले आत्मा में सदा तृप्त रहने के कारण, न तो आनन्दित होता है, न ग्लानि को प्राप्त होता हे,
न अस्त होता है ओर न उदय को ही प्राप्त होता है, किन्तु समानरूप होकर अवस्थित रहता है । द्वित्व
ओर एकत्व आदि से युक्त जिस पुरुष का मन चंचल रहता है उसीका शरीर अन्यरूपता को प्राप्त हो
जाता है, चंचलतारहित पुरुष का कभी नहीं