Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, Verses 35–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 103, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 35,36

संस्कृत श्लोक

तं तथाभूतमालोक्य भर्तुर्देहं वराङ्गना । अनुज्झितवती देहं चिन्तयामास सत्वरम् ॥ ३५ ॥ चित्तत्त्वं सर्वगं शुद्धं प्रविश्याबोधयाम्यहम् । भविष्यद्बोधनं कान्तमथ तत्र हि संस्थिता ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रश्न का समाधान कर प्रस्तुत विषय का अनुसन्धान करते है। अपने स्वामी की उस तरह से अवस्थित देह को देखकर अपने शरीर का त्याग न करती हुई सुन्दर अंगों से सुशोभित उस चूडाला ने शीघ्र विचार किया । सर्वव्यापक विशुद्ध चितितत्त्व मे प्रविष्ट होकर अर्थात्‌ अपने स्वामी की काया में प्रवेश द्वारा स्वामी के ही हार्द ब्रह्म मे प्रविष्ट होकर वहाँ स्थित होती हुई में चिरकाल के बाद जागनेवाले अपने स्वामी को जगाती ह