Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verses 1–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 104, verses 1–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 1-9

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्यध्यात्मविचित्राभिः कथाभिस्तौ परस्परम् । आसाते वेद्यवेत्तारौ मुहूर्तत्रितयं वने ॥ १ ॥ तत उत्थाय कस्मिंश्चित्सानौ सरससारसे । सरोवरे वने चैव विहृतौ नन्दने वने ॥ २ ॥ तेनाचारेण ताभिश्च कथाभिस्तौ वने ततः । नीतवन्तौ दिनान्यष्टौ तासु काननवीथिषु ॥ ३ ॥ अथ कुम्भ उवाचान्यद्वनं यावो गिराविति । तदोमिति नृपो मत्वा तावुभौ प्रविचेरतुः ॥ ४ ॥ वनान्यनेकरूपाणि जङ्गलानि तटानि च । सरांसि गुल्मजालानि श्रृङ्गाणि गहनानि च ॥ ५ ॥ नदीर्देशांस्तथा ग्रामान्नगराणि वनानि च । मञ्जुघोषान्गिरीन्कुञ्जांस्तीर्थान्यायतनानि च ॥ ६ ॥ सममेव समस्नेहौ समवेतौ स्थितावुभौ । समसत्त्वौ समोत्साहौ शंसन्तौ तस्थतुः सदा ॥ ७ ॥ आनर्चतुः पितृन्देवान्बुभुजाते च राघव । समं तप्ते च सिक्ते च समबुद्धी बभूवतुः ॥ ८ ॥ तमालवनखण्डेषु मन्दारगहनेषु च । दंपती स्निग्धहृदयौ सुहृदौ तौ विरेजतुः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, यों अध्यात्मविषयक विचित्र कथाओं को परस्पर कह रहे वे दोनों तत्त्वज्ञानी तीन मुहूर्त तक वन में स्थित रहे । उसके बाद वहाँ से उठकर फल-मूल आदि के द्वारा रक्षा करनेवाले, आनन्ददायक किरी पर्वत की चोटीपर जाकर विहार करने लगे, जहाँ सरस कमल ओर सारस पक्षियों के जोड़ सुशोभित हो रहे थे फिर वहाँ से उठकर उस महाअरण्य की उन वनवीथियों में जीवन्मुक्तो के प्रसिद्ध आचार के अनुसार व्यवहार करते हुए तथा अध्यात्मविषयक विचित्र कथाओं से परस्पर संलाप करते हुए उन दोनों ने आठ दिन गँवा दिये । उसके अनन्तर कुम्भ ने कहा: राजन्‌, चलिए, किसी दूसरे जंगल में किसी पर्वत के ऊपर चलें । राजा ने उसे स्वीकार कर लिया, तब वे दोनों वहाँ से चल पड़े अनेक तरह के वनों, जंगलों, नदी के तटों, अनेक तालाबों, गुल्मसमूहों (कुजो), गहन पर्वत की चोटियों, बहुत-सी नदियों, नाना देशों, ग्रामो, नगरों, उपवनों, मनोहर शब्दवाले पर्वतो, कुजो, तीर्थो ओर आश्रमो में पहुँचकर समानस्नेह से युक्त, वे दोनों मिलकर तुल्यचित्तवृत्ति से युक्त होकर परस्पर एक दूसरे से अपना अनुभव कहते थे, वे दोनों समानचित्त तथा समान उत्साहवाले थे । हे राघव, वे दोनों पितर ओर देवताओं की एक साथ पूजा करते थे, एक ही साथ वे दोनों भोजन करते थे। सन्तप्त तथा जलार्द्र शीतल प्रदेशों मे उन दोनों की बुद्धि समान थी । स्निग्धह्नदय वे दोनों मित्र स्त्रीपुरुष तमालवनखण्डों में और मन्दार के जंगलों में विहार करते फिरे

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ तीनवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चारवो सर्ग कुम्भ के रमण से राजा की संभोगेच्छा, स्वर्ग के बहाने नगर में जाना और खिन्न होकर वहाँ से फिर लौट आना।