Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 104, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
यावत्तिलं यथा तैलं यावद्देहं तथा दशा ।
यो न देहदशामेति स च्छिनत्त्यसिनाम्बरम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
जब तक देह रहेगी तब तक प्रारब्धप्रयुक्त कर्मेन्द्रियों में हर्ष-गलानि आदि दशा ज्ञानी ओर अज्ञानी
दोनों में एक-सी रहेगी ही, इसी आशय से दृष्टान्तपूर्वक कहते है ।
जैसे जब तक तिल है तब तक तेल भी है, वैसे ही जब तक देह रहेगी तब तक कर्मेन्द्रियों द्वारा प्राप्त
हर्ष ओर ग्लानि आदि की दशा रहेगी ही ।
उसीको व्यतिरेकी दृष्टान्त से दृढ़ करते है ।
जो देहदशा को प्राप्त नहीं होता वह खड्ग से आकाश का छेदन करता हे तात्पर्य यह है कि
ज्ञानियों को भी देहदशा का अतिक्रमण होता ही नहीं, अतः मैं भी उसका अनुकरण करूँ तो क्या
दोष हे