Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 104, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
परमेष्ठिप्रभृतयः सर्व एवोदिताशयाः ।
देहावस्थासु तिष्ठन्ति नियतेरेष निश्चयः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्मेन्द्रियों के द्वारा देहदशाओं में अनिषिद्ध का अनुवर्तन ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण जीवन्मुक्तो में प्रसिद्ध
ही है, यह कहते हैं।
ब्रह्मा आदि सभी उदित हृदय से युक्त (जीवनमुक्त) ज्ञानी लोग देह की अवस्थाओं में अवस्थित
रहते हैं, यही प्रारब्धकर्मरूप नियति का निश्चय है