Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 104, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
अज्ञतत्त्वज्ञभूतानि दृश्यजातमिदं हि यत् ।
तत्सर्वमेव नियतिं धावत्यम्बु यथाम्बुधिम् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रारब्धकर्मरूपी नियति का उल्लंघन अज्ञ या तत्त्वज्ञ किसीसे नहीं किया जा सकता, इसे कहते हैं ।
अज्ञ या तत्त्वज्ञ सर्वविध प्राणियों से समन्वित जो यह दृश्यसमूह हे वह सब नियति की ही ओर उस
तरह दोडता हे, जिस तरह जल सागर की ओर