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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 105, Verses 22–24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 105, verses 22–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 105 · श्लोक 22-24

संस्कृत श्लोक

यथागतमयं देहो मत्तोऽन्योऽनुभविष्यति । शिखिध्वज उवाच । परिदेवनया कोऽर्थो देवपुत्र तथैतया ॥ २२ ॥ यदायाति तदायातु देहस्यात्मा न लिप्यते । कानिचिद्यानि दुःखानि सुखानि विहितानि च ॥ २३ ॥ तानि सर्वाणि देहस्य देहिनो न तु कानिचित् । यदि त्वमपि कार्याणामखेदार्होऽपि खिद्यसे ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

राजा भी उसके कथन का अनुमोदन कर कहते है। राजा शिखिध्वज ने कहा : हे देवपुत्र, उस तरह की इस व्यर्थ चिन्ता से कौन अर्थ सिद्ध होनेवाला है। प्रारब्धवश जो आता है, उसे आने दीजिए, उससे देह की आत्मा लिप्त नहीं हो सकती। जो भी कुछ सुख या दुःख आते जाते हैं, वे सब देह के लिए ही आते-जाते हैं, उनमें से कोई भी देही आत्मा के (देहोपलक्षित चैतन्यात्मा के) लिए नहीं । मुनिवर, अवश्य प्राप्त होनेवाले प्रारब्धकर्म-फलों के विषय में कभी खेद न करनेवाले आप भी यदि खेद करने लग जायेंगे, तो अविवेकी पुरुषों को अविवेकजनित खेद की चिकित्सा के लिए आपके सदृश शास्त्रीय तत्त्व का अनुभव करानेवाला दूसरा कोन चिकित्सक शरण देगा अर्थात्‌ कोई भी नहीं देगा