Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 105, Verses 18–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 105, verses 18–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 105 · श्लोक 18-21
संस्कृत श्लोक
अहमप्यद्य यद्दैवाद्यूनामामिषतां गतः ।
कष्टं मदपहारेण कलहो जायतेऽधुना ॥ १८ ॥
दिवि देवकुमाराणां कामाकुलधियामिह ।
गुरुदेवद्विजातीनां लज्जापरवशात्मना ॥ १९ ॥
कथमग्रे मया सम्यग्वस्तव्यं यामिनीस्त्रिया ।
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इत्युक्त्वा क्षणमेकं सा तूष्णीं स्थित्वा मुनिस्थितौ ॥ २० ॥
धैर्यमाश्रित्य कुम्भोऽत्र पुनराह रघूद्वह ।
किमज्ञ इव शोचामि किं मम क्षतमात्मनः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी न्याय का स्पष्टीकरण करते है ।
महान् कष्ट यह हो गया कि अब मेरे अपहरण के लिए यहाँ स्वर्ग में कामव्याकुल मति देवकुमारो
में संघर्ष छिड जायेगा । गुरुजन, देवता एवं ब्राह्मणों के सामने रात में लज्जापरवश स्त्रीरूप मैं किस
तरह से निरावाध वास कर सर्वूगा । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामभद्र, उस तरह कहकर वह
कुम्भ एक क्षण तक चित्त की एकाग्रता में चुपचाप स्थित होकर इस विषय में धैर्य धारणकर फिर
बोलने लगा । अज्ञानी की तरह मैं क्यों सोच रहा हूँ, मेरी आत्मा का इससे क्या बिगड़ा । प्रारब्ध के
अनुसार प्राप्त हुए स्त्रीभाव का मुझसे अन्य यह शरीर ही अनुभव करेगा । इससे असंग चिन्मात्रस्वरूप
मेरी क्षति क्या हुई