Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 106, Verses 1–26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 106, verses 1–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 1-26
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ततः कतिपयेष्वेव दिवसेषु गतेषु सा ।
इदं प्रोवाच भर्तारं कुम्भरूपधरा सती ॥ १ ॥
राजन्राजीवपत्राक्ष ममेदं वचनं श्रृणु ।
निशायां प्रत्यहं तावत्स्थित एवाहमङ्गना ॥ २ ॥
तदिच्छाम्यङ्गनाधर्मं निपुणीकर्तुमीदृशम् ।
भर्त्रे कस्मैचिदात्मानं विवाहेन ददाम्यहम् ॥ ३ ॥
तद्भवानेव मे भर्ता रोचते भुवनत्रये ।
गृहाण मां विवाहेन भार्यात्वे निशि सर्वदा ॥ ४ ॥
अयत्नोपनतं साधो प्रियेण सुहृदा सह ।
स्त्रीसुखं भोक्तुमिच्छामि मा मे विघ्नकरो भव ॥ ५ ॥
क्रमप्रवृत्तमासृष्टेः सुखं साध्यं मनोरमम् ।
प्रकृतं कुर्वतः कार्यं दोषः क इव जायते ॥ ६ ॥
इच्छानिच्छे फले त्यक्त्वा समन्तात्सर्ववस्तुषु ।
वयं न सेच्छा नानिच्छाः कुर्मस्तेनेदमीप्सितम् ॥ ७ ॥
शिखिध्वज उवाच ।
कृतेनानेन कार्येण न शुभं नाशुभं सखे ।
पश्यामि तन्महाबुद्धे यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ८ ॥
समतां संप्रयातेन चेतसेदं जगत्त्रयम् ।
स्वरूपमेव पश्यामि यथेच्छसि तदाचर ॥ ९ ॥
कुम्भ उवाच ।
यद्येवं तन्महीपाल लग्नमद्यैव शोभनम् ।
राकेयं श्रावणस्यास्य ह्यः सर्वं गणितं मया ॥ १० ॥
रात्रावद्योदिते चन्द्रे परिपूर्णकलामले ।
जन्यत्रो नौ महाबाहो द्वयोरेव भविष्यति ॥ ११ ॥
महेन्द्राद्रिशिरःश्रृङ्गसानावद्य मनोरमे ।
रत्नदीपप्रकाशाढ्ये मणिकन्दरमन्दिरे ॥ १२ ॥
पुष्पभारानतोत्तुङ्गवृक्षराजिविराजिते ।
वनपुष्पलतालास्यनारीनृत्यमनोहरे ॥ १३ ॥
निशि व्योमगतास्तारा भर्त्रा पूर्णेन्दुना सह ।
आवयोः परिपश्यन्तु कर्णान्तायतलोचन ॥ १४ ॥
उत्तिष्ठात्मविवाहार्थं कुर्वः काननकोटरात् ।
राजेश्चन्दनपुष्पादिसंभारं रत्नसंयुतम् ॥ १५ ॥
इत्युक्त्वा कुम्भ उत्थाय सह तेन महीभृता ।
कुसुमावचयं चक्रे तथा रत्नादिसंचयम् ॥ १६ ॥
ततो मुहूर्तमात्रेण रत्नसानौ समे शुभे ।
समालम्भनपुष्पाणां ताभ्यां वै राशयः कृताः ॥ १७ ॥
हाराम्बरमणीन्द्रादिराशयस्त्वपरेऽजिरे ।
सौभाग्यस्येव कामेन कोशाः कालेन संभृताः ॥ १८ ॥
तथा जन्यत्रसंभारं कृत्वा काञ्चनकन्दरे ।
ययतुस्तौ महामित्रे स्नातुं मन्दाकिनीं नदीम् ॥ १९ ॥
तत्रैनं स्नापयामास महाराजं महादरात् ।
गजकुम्भोपमस्कन्धं कुम्भो मङ्गलपूर्वकम् ॥ २० ॥
भविष्यद्दयितारूपां भविष्यद्दयितोऽङ्गनाम् ।
चूडालां स्नापयामास कुम्भरूपधरां प्रियाम् ॥ २१ ॥
पूजयामासतुः स्नातौ तत्र देवपितृन्मुनीन् ।
यथा क्रियाफलेऽनिच्छौ क्रियात्यागे तथैव तौ ॥ २२ ॥
नित्यज्ञानरसातृप्तौ व्यवस्थायां जगत्स्थितेः ।
चक्राते भोजनं भव्यं तावन्योन्यसमीहितम् ॥ २३ ॥
कल्पवृक्षदुकूलानि परिधाय सितानि तौ ।
फलानि भुक्त्वा जन्यत्रस्थानमाययतुः क्रमात् ॥ २४ ॥
एतावताथ कालेन तयोर्जन्यत्रसोत्कयोः ।
प्रियं कर्तुमिवास्ताद्रिं द्रागित्येवाविशद्रविः ॥ २५ ॥
अथ संध्याक्रमे वृत्ते कृते जप्याघमर्षणे ।
विवाहदर्शनायैव ताराजाले खमागते ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, तदनन्तर कुछ ही दिनों के बीत जाने पर वह
कुम्भरूपधारिणी चूडाला अपने पति से यह कहने लगी । कमलपत्र के सदुश विशाल नेत्रवाले हे राजन्,
मेरा यह वचन आप सुनिये । प्रतिदिन मैं रात में स्त्री ही बनकर रहता हूँ । इसलिए मैं ऐसा स्त्रीरूप को
सफल बनाना चाहता हूँ, अतः किसी स्वामी को मैं उस अपने रत्री शरीर का विवाह द्वारा प्रदान करूँगा ।
इस त्रिलोकी में आप ही एक भर्ता के रूप में मुझे पसन्द पड रहे है । अतः रात में विवाह द्वारा अपनी भार्या
के रूप मेँ मेरा सदा स्वीकार कीजिए । हे साधो, अपने प्रियमित्र के साथ अनायास प्राप्त हुआ स्त्रीसुख
भोगने की इच्छा कर रहा हूँ, अतः आप मेरी प्रार्थना का खण्डनकर मेरे विघ्नकारक मत बनिये । राजन्,
सृष्टि के आरम्भ से लेकर आज तक देवता, ऋषि आदि सबमें चले आ रहे ओर विना बाधा के हो रहे इस
प्रस्तुत विवाह कार्य को यदि आप करे, तो वैसा कर रहे आपको क्या दोष लगेगा अर्थात् कुछ नहीं । सब
वस्तुओं मे इच्छा, अनिच्छा ओर तज्जनित फलों का चारों ओर से त्याग करके हम लोग न तो इच्छावाले
हैं और न अनिच्छावाले हैं, इसलिए इस अभीष्ट कार्य को करें, कुछ भी विगड़गा नहीं । शिखिध्वज ने
कहा : हे सखे, इस विवाह कार्य को करने से न शुभफल या न अशुभ फल देखता हूँ, इससे हे महाबुद्धे,
आप जैसा चाहें, वैसा करें समरूप बन गये इस चित्त में मे ये तीनों जगत् अपना ही रूप जानता हूँ,
अतः जैसा चाहें, वैसा करे । कुम्भ ने कहा : हे महीपाल, यदि यह बात है, तो आज ही शुभ लग्न है । यह
चल रहे श्रावण की पूर्णिमा है । कल ही मैंने विवाहलग्न आदि सबका गणित कर लिया है । हे महावाहो,
आज रात में ही जब कि समस्त कलाओं से परिपूर्ण निर्मल चन्द्रमा उदित होगे, तब ही अपने दोनों का
गान्धर्वविधि से विवाह होगा। हे कान तक के लम्बे-लम्बे नेत्रोवाले महाराज, यह जो मनोरम, महेन्द्रपर्वत
के माथे के ऊपर सींग-जैसा उन्नत शिखर है, जहाँ रत्नरूपी दीपको का पूर्ण प्रकाश पडता है, मणिमय
कन्दरारूपी अनेक मन्दिर है, जो पुष्पों के बोझों से झुके हुए ऊँचे-ऊँचे अनेक वृक्षों से सुशोभित हे,
जंगली फूलों की लताओं के विलासपूर्णं रमणीय नृत्यं से लुभावना लगता है, उस शिखरपर अपने
प्रिय पति पूर्णचन्द्र के साथ आकाशगत तारिकाएँ रात में हम दोनों का विवाह देखें हे राजन्, अव आप
उठिये, जंगल के कोटरो से विवाह के लिए हम लोग रत्नों के साथ चन्दन, पुष्प आदि सामग्री को एकत्र
करं । यों कहकर कुम्भ उठे ओर उस राजा के साथ फूलों को बिनने तथा रत्न आदि का संचय करने लग
गये । तदनन्तर एक मुहूर्त में उन दोनों ने सुन्दर चिकने उस रत्नप्रचुर शिखर पर एक स्थान में देवता,
अग्नि आदि का पूजन करने के लिए पुष्पों के ढेर के ढेर बना डाले । दूसरे स्थान में भी हार, अम्बर मणि
आदिके यथेच्छ ढेर के ढेर उस प्रकार लगा दिये, जिस प्रकार पुण्य के परिपाक-काल से मानों सौभाग्य
के यथेच्छ ढेर के ढेर लगा दिये गये हों । उस प्रकार सुवर्णं की गुफा में विवाह की सामग्री एकत्रित कर वे
दोनों महामित्र गंगानदी में स्नान के लिए चले गये । वहाँ कुम्भ ने गजराज के गण्डस्थल के सदृश सुदृढ़
कन्धों वाले महाराज शिखिध्वज को बड़े ही आदर से दही, दूध, अक्षत आदि मंगल द्रव्यो से स्नान
कराया । भविष्यकाल की दयिता कुम्भरूप धारण की हुई प्रिय अंगना चूडाला को भविष्य के स्वामी
राजा शिखिध्वज ने भी मंगलरनान कराया । अनन्तर, वहाँ पर स्नान किये उन दोनों नें देवता, पितर
ओर ऋषियों की पूजा की । ज्ञानी होते हुए भी उनकी पूजा में प्रवृत्ति इसलिए हुई कि वे जैसे क्रियाजनित
फलों में अनिच्छा रखते थे, वैसे ही क्रियाफलं के त्याग में भी अनिच्छा रखते थे । यद्यपि वे शाश्वत
आत्मज्ञानरूपी रस से पूरी तरह तृप्त थे, तथापि इस जगतीस्थिति की व्यवस्था के लिए उन्होने सिद्धि
के प्रभाव से निर्मित अन्न आदि का भव्य भोजन किया । तदनन्तर धवल, कल्पवृक्ष के वस्त्रों का परिधान
कर वे दोनों कल्पवृक्ष के फल खाकर शास्त्रोक्त क्रम से विवाह की वेदी की ओर बढ़ आये । इधर इतने
समय से विवाह के लिए उत्कण्ठित हो रहे उन दोनों का मानों प्रिय करने के लिए तत्काल ही भगवान्
भास्कर ने अस्ताचल की ओर प्रस्थान किया। अनन्तर उनकी सन्ध्यावन्दन आदि विधि समाप्त हो गई,
मन्त्र-जप, अघमर्षण आदि भी उन्होने कर लिया । इधर उनका विवाह देखने के लिए आकाशमण्डल में
समस्त तारे भी आ धमके
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ पाँचवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छठा सर्गं महेन्द्रपर्वत पर अग्नि के सामने उन दोनों का विवाह और सुवर्णं गुफा में पुष्पशय्या पर समागम-यह वर्णन ।