Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 105, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 105, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 105 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
कैलासमन्दरमहेन्द्रसुमेरुसह्यसानुष्वविस्खलितयोगगमागमा सा ।
साकं प्रियेण सुहृदा भवता यथेच्छं स्रग्दामहारवलिता विजहार नारी ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
किस-किस स्थान में किस-किस तरह उसने विहार किया ?
कैलास, मन्दराचल, महेन्द्राचल, सुमेरु तथा सहाद्रि आदि पर्वतो के शिखरो पर योगबल से
अस्खलित गमनागमन कर रही अपने अनुकूल वर्ताव कर रहे प्रिय मित्र पति के साथ वह नारी चूडाला
पुष्प मालाओं ओर हारों से अलंकृत होकर इच्छानुसार विहार करती थी