Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 107
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 107 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 107
संस्कृत श्लोक
युक्तं मुक्तं च चिद्दीपं बहिरन्तरुपास्महे ।
हृत्सरःपद्मिनीकन्दं तन्तुं सर्वाङ्गसुन्दरम् ।। १०७
हिन्दी अर्थ
कमलिनी की जड़ की नाई हृदयरूपी सरोवर में गुप्त होकर अवस्थित; हाथ, पैर आदि अंग-
प्रत्यंगों के दृढ बन्धन में, सुन्दर रस्सी की तरह, हेतुभूत तन्तु; एवं जनसमुदाय के जीवन के उपायभूत
चिदाकार आत्मस्वरूप को मैं प्राप्त हुआ हूँ