Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 108
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 108 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 108
संस्कृत श्लोक
जनताजीवनोपायं चिदात्मानमुपागतः ।
अक्षीरार्णवसंभूतमशशाङ्कमुपस्थितम् ।। १०८
हिन्दी अर्थ
प्रसिद्ध “अमृत” पदार्थ से इसकी विलक्षणता बतलाते हैं।
हेश्रीरामजी, जो क्षीरसमुद्र से उत्पन्न अमृत से विलक्षण है, जो चन्द्रमा में स्थित अमृत से भी विलक्षण
है, जो सदा-सर्वदा प्राप्त ही रहता हे ओर जो गरूड आदि से अपहृत नहीं किया जा सकता, उस सत्य
एवं अमृतरूप चिदात्मा की हम लोग उपासना करते हैं