Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
असंकल्पेन नष्टानां कः प्रसङ्गोऽत्र वर्धते ।
ब्रह्मण्येव हि सर्वस्मिंश्चरणस्पन्दनादिकम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
परिपूर्णस्वरूप इस परब्रह्म मे ही गमन आदि सब कुछ है, चूँकि परिपूणत्मिक ब्रह्म ही सुखेकरसरूप
से स्फुरित होता है, अतः उसमें दुःख ओर सुख कैसे ?