Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
स्फुरति ब्रह्म सकलं सुखितादुःखिते कुतः ।
ब्रह्म ब्रह्मणि संतृप्तं ब्रह्म ब्रह्मणि संस्थितम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म ही ब्रह्म में भली प्रकार तृप्त
है, ब्रह्म में ब्रह्म ही भली प्रकार अवस्थित हे, ब्रह्म में ब्रह्म ही स्फुरित होता है, अतः मैं ब्रह्म से
अतिरिक्त स्वरूपवाला नहीं हूँ