Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
अन्धं भुवनमन्धस्य प्रकाशं तु सचक्षुषः ।
जगदेकात्मकं ज्ञस्य मूर्खस्यातीव दुःखदम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे बालक की दृष्टि में रात्रि स्वभ्रान्ति से परिकल्पित यक्षवाली और युवा, वृद्ध आदि पुरुषों
की दृष्टि में विशुद्ध यक्षवर्जित प्रतीत होती है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष को यह जगत एकमात्र आनन्दमय
ब्रह्मस्वरूप अनुभूत होता है और अज्ञानी पुरुष को अत्यन्त दुःखद प्रतीत होता है