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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verses 34–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verses 34–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

शिशोरिव स्फुरद्यक्षा निशा पुंसस्तु केवला । अस्मिन्ब्रह्मघटे नित्यमेकस्मिन्सर्वतः स्थिते ॥ ३४ ॥ न किंचिन्म्रियते नाम न च किंचन जीवति । यथोल्लासविलासेषु न नश्यति न जायते ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

सदा-सर्वदा चारों ओर अवस्थित, अमृतपूर्ण ब्रह्मरूपी घट में न कोई मरता है और न कोई जीता है