Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verses 38–39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verses 38–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 38,39
संस्कृत श्लोक
तरङ्गकणजालेन पयसीव पयो घनम् ।
शरीरनाशेन कथं ब्रह्मणो मृतधीर्भवेत् ॥ ३८ ॥
ब्रह्मणो व्यतिरिक्तं हि न शरीरादि विद्यते ।
पयसो व्यतिरेकेण तरङ्गादि महार्णवे ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी, शरीर के विनाश से ब्रह्म में मृतबुद्धि कैसे हो
सकती है ? क्योकि शरीर आदि ब्रह्म से उस प्रकार पृथक् नहीं हैं जिस प्रकार सागर में तरंगादि जल से
अतिरिक्त नहीं हैं