Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verses 40–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verses 40–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 40,41
संस्कृत श्लोक
यः कणो या च कणिका या वीचिर्यस्तरङ्गकः ।
यः फेनो या च लहरी तद्यथा वारि वारिणि ॥ ४० ॥
यो देहो या च कलना यद्दृश्यं यौ क्षयाक्षयौ ।
या भावरचना योऽर्थस्तया तद्ब्रह्म ब्रह्मणि ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल में जो कण है, जो कणिका हे, जो वीचि है, जो तरंग है, जो
फेन है, और जो लहरी है, वे सब जलस्वरूप ही हैं, वैसे ही ब्रह्म में कल्पित जो देह है, जो इन्द्रिय-
व्यापार है, जो भोग्य है, जो संपत्ति और विपत्ति है, जो हर्ष, विषाद आदि रचना है और जो पुरुषार्थभोग
है, वह सब ब्रह्मस्वरूप ही है