Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
बन्धुरेवापरिज्ञातो ह्यबन्धुरिति कथ्यते परिज्ञातो भवेद्बन्धुरबन्धुभ्रमनाशनात् ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस तरह भली प्रकार अपरिचित बन्धु ही अबन्धु कहा जाता है, परिज्ञात हुआ वही बन्धुशब्द से
व्यवहृत होता है, क्योकि अबन्धुभरम उससे विनष्ट हो जाता है, उसी तरह प्रकृत स्थल में भी जानना
चाहिए