Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
द्वैतं त्वसत्यमित्यन्तर्ज्ञाते सोदेति भावना ।
तस्माद्वैताच्च वैरस्याद्यया किल विरज्यते ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत के विषय में उक्त विचारणा तत्पदार्थ के शोधन के रूप में पर्यवसित होती है, इस आशय से
जगदंश में उक्त विषय को स्पष्ट कहते है।
द्वित असत्य है ' इस प्रकार भीतर द्रत में असत्यत्व का ज्ञान हो जाने पर वह ब्रह्मभावना उदित
होती है, इसीसे द्वैत की असत्यता सिद्ध हो जाने के कारण पुरुष द्वैत जाल से विरक्त हो जाता हे